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अयोध्या विवाद - सुलझी हुई अनसुलझी पहेली

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क्या हिन्दुओं के भगवान राम काल्पनिक हैं? क्या भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था? और यदि हुआ था तो उसके सबूत क्या हैं? अजीब विडम्बना है हमारे देश की, जिन भगवान् राम के नाम पर जगह- जगह रामलीलाओं का मंचन होता है, जिनकी लंका पर जीत की खुशी में जगह-जगह रावण दहन होता है और जिनके अयोध्या वापस आने की खुशी में हर वर्ष दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है, उन्हीं भगवान् राम के जन्मस्थान को लेकर रोज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की गई और उनके अस्तित्व पर सवाल उठाये गए, सबूतों की मांग की गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है, अब सबको फैसले का इंतजार है।



पुराणों के अनुसार अयोध्या को रामायण में प्राचीन कौशल साम्राज्य की राजधानी कहा गया था। इसलिए इसे कौसला कहा जाता था। आदि पुराण बताता है कि अयोध्या की समृद्धि और अच्छे कौशल की वजह से सु-कोशल के रूप में प्रसिद्ध है। अयोध्या के इतिहास का उद्गम ब्रह्माजी के मानस पुत्र मनु से ही सम्बद्ध है। अयोध्या का सूर्यवंश मनु के पुत्र इक्ष्वाकु से प्रारम्भ हुआ। इस वंश में राजा रामचंद्रजी के पिता दशरथ ं63वें शासक हैं। अयोध्या का महत्व इस बात में भी निहित है कि जब भी प्राचीन भारत के तीर्थों का उल्लेख होता है तब उसमें सर्वप्रथम अयोध्या का ही नाम आता है। अयोध्या मथुरा माया काशि काँची ह्य्वान्तिका, पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका, यहाँ यह भी ध्यान देने वाली बात है कि इन प्राचीन तीर्थों में प्रयाग की गणना नहीं है! अयोध्या के महात्म्य के विषय में यह और स्पष्ट करना होगा कि जैन परंपरा के अनुसार भी 24 तीर्थंकरों में से 22 इक्ष्वाकु वंश के थे। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में जन्मभूमि की शोभा एवं महत्ता की तुलना दूसरे इन्द्रलोक से की है। धन-धान्य व रत्नों से भरी हुई अयोध्या नगरी की अतुलनीय छटा एवं गगनचुंबी इमारतों के अयोध्या नगरी में होने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में मिलता है।

 

इतिहासकारों के अनुसार कौशल प्रदेश की प्राचीन राजधानी अवध को कालांतर में अयोध्या और बौद्धकाल में साकेत कहा जाने लगा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर था। हालांकि यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़े मंदिरों के अवशेष देखे जा सकते हैं। कहते हैं कि सिकंदर लोदी के शासनकाल के दौरान यहां मंदिर मौजूद था। 14वीं शताब्दी में हिन्दुस्तान पर मुगलों का अधिकार हो गया और उसके बाद ही राम जन्मभूमि एवं अयोध्या को नष्ट करने के लिए कई अभियान चलाए गए। अंततः 1527-28 में इस भव्य मंदिर को तोड़ दिया गया और उसकी जगह बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया जो 1992 में मंदिर-मस्जिद विवाद के चलते रामजन्मभूमि आन्दोलन के दौरान ढहा दी गई।

 

अयोध्या विवाद एक राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक- धार्मिक विवाद है। इस विवाद का मूल मुद्दा राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की स्थिति को लेकर है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाया गया या मंदिर को मस्जिद के रूप में बदल दिया गया? बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का ये विवाद 490 साल पुराना है। जो नब्बे के दशक में सबसे ज्यादा उभार पर था। 6 दिसंबर 1992 को हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया। इसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। जल्दबाजी में एक अस्थायी राम मंदिर बनाया गया। 16 दिसंबर 1992 को मस्जिद की तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन हुआ।

 

अप्रैल 2002 को अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की। मार्च-अगस्त 2003 को इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में जमीन बंटी। मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। 2017 से इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज तक हो रही है। राम मंदिर था या नहीं, ये बहस अनंत काल तक चलाई जा सकती है, लेकिन मुद्दा इतिहास या तार्किकता का नहीं बल्कि धर्म के नाम पर बरगलाने और उसके सहारे सत्ता पर कब्जे की सांप्रदायिक योजना का है।

 

सांप्रदायिक विचारधारा वास्तव में राजनीतिक रूप से बहुत मजबूत हो गयी है। यदि हम मुस्लिम शासकों को गलत करता मान लें तो क्या जो वे 12वीं से 17वीं शताब्दियों तक करते रहे, वही हम 21वीं सदी में करते हुए विकसित, अधिक सभ्य दिख रहे हैं? क्या यह देश और उसकी राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए उपयुक्त और सराहनीय कदम है? लोगों को यह बात समझाना जरूरी है कि इतिहास का सबसे बड़ा सबक है कि अतीत की गलतियां दोहराई नहीं जानी चाहिए। मध्यकाल में जो कुछ हुआ है वो इसीलिए नहीं दोहराया जाना चाहिए क्योंकि अगर हम आज पुराने बदले चुकाने बैठ जाएंगे तो वर्तमान चैपट हो जाएगा। शायद ऐसी ही सोच के साथ गीतकार आनंद बक्षी ने क्या खूब लिखा “देखो ओ दीवानो, तुम ये काम ना करो...राम का नाम बदनाम ना करो”। 


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