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आखिरकार खत्म हुआ बरसों का इंतजार

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आखिरकार देश के लोगों का बरसों पुराना इंतजार खत्म हो गया है। सभी अटकलों पर पूर्ण विराम लगाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने वैज्ञानिक ढंग से अयोध्या मामले पर फैसला सुनाते हुए देश में सांप्रदायिक सौहार्द का एक उदाहरण पेश किया है। उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए विवादित भूमि पर राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि को रामलला को सौंप दिया और सरकार को यह निर्देश दिया कि 3 महीने के भीतर ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण का कार्य पूर्ण किया जाए। इसके साथ ही न्यायालय ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है।

 

इस फैसले को वैज्ञानिक रूप दिया जा रहा है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले में एएसआई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि खुदाई में निकले सबूतों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सर्वेक्षण के दौरान विवादित ढांचे के नीचे मंदिर के विशाल अवशेष बरामद हुए थे जिसे 12 वीं सदी का मंदिर बताया गया था। एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि खुदाई में मिला अवशेषों व कलाकृतियों का मस्जिद से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। हालांकि कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट पर अपने रुख को स्पष्ट करते हुए यह भी कहा है कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई गई थी।

 

आस्था की नगरी अयोध्या ने लगभग 500 साल तक दो समुदायों की आस्था के इस टकराव को झेला। 21 मार्च 1528 को बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में बने राम मंदिर को ध्वस्त कराया था। इस विवाद को हल करने में कई प्रयास विफल हुए और यह मामला दिन प्रतिदिन उलझते ही चला गया। राम जन्मभूमि भारतीय जनमानस की आस्था का केंद्र है, ऐसे में इस पर चल रहा है यह विवाद देश के सांप्रदायिक सौहार्द को चुनौती दे रहा था। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम के पुत्र कुश ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर विशाल मंदिर का निर्माण कराया था। समय के बढ़ते चक्र ने जब मंदिर की इमारतों को कमजोर किया तो विक्रमादित्य नाम के शासक ने इसका उद्धार किया। 57 ईसा पूर्व जिस मंदिर को विक्रमादित्य ने निर्मित कराया था उसे मीर बाकी ने 1528 ईसवी ने तोड़ा था। वैसे इतिहास के पन्नों को पलटने पर यह भी पता चलता है मध्यकालीन की शुरुआत से ही मंदिर पर संकट मंडराने लगा था। अपने सत्ता के विस्तार के लिए महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार तुर्क ने अयोध्या पर आक्रमण किया था। पर उसका यह आक्रमण राजा सुहेलदेव द्वारा कुचल दिया गया। उसके बाद 1440 ईस्वी में जौनपुर के शासक महमूद शाह के शासन क्षेत्र में अयोध्या के शामिल होने का उल्लेख मिलता है। अगर इतिहास के पारंपरिक स्रोतों को ध्यान से देखें तो यह पता चलता है कि राम मंदिर के लिए 76 युद्ध लड़े गए थे। 1530 से 1556 ईस्वी के मध्य हुमायूं एवं शेरशाह के शासन काल में लगभग 10 युद्धों का उल्लेख मिलता है। हिंदुओं की ओर से इन युद्धों का नेतृत्व हंसवर की रानी जयराज कुंवरी एवं स्वामी महेशानंद ने किया। उनके सैनिकों की शहादत से इस युद्ध की प्रबलता का अंदाजा लगाया जा सकता है। 1556 से 1605 ईसवी के मध्य जलालुद्दीन अकबर के शासनकाल में लगभग 20 युद्धों का जिक्र मिलता है। इन योद्धाओं की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है अयोध्या के ही संत सेनापति बलरामाचार्य के युद्ध कौशल ने अकबर को इस ओर ध्यान देने पर विवश कर दिया। अकबर ने बीरबल और टोडरमल किराए पर बाबरी मस्जिद के सामने चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की इजाजत दी। उसके बाद कट्टरवादी नीतियों के लिए प्रख्यात अकबर का वंशज औरंगज़ेब की नीतियों का भी इस विवाद पर गहरा असर पड़ा। 1658 से 1707 ईसवी के मध्य उसके शासनकाल में राम मंदिर पर लगभग 30 बार युद्ध हुए। एनी योद्धाओं का नेतृत्व कुंवर गोपाल सिंह, बाबा वैष्णव दास, ठाकुर जगदंबा सिंह आदि ने किया। ऐसा माना जाता है कि इन युद्धों में सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने निहंगों को इस संघर्ष के लिए भेजा था। इतिहास में यह कहा गया है की आखिरी युद्ध को छोड़कर बाकी में हिंदुओं को कामयाबी मिली। ऐसा माना जा सकता है की औरंगजेब ने अपनी पूरी ताकत से इस जमीनी युद्ध को अपने पक्ष में किया होगा। उसी के आदेश पर अयोध्या के बाकी प्रमुख मंदिरों को भी तोड़ा गया होगा। 18 वीं शताब्दी के मध्य तक मुगल सत्ता का भला ही पतन हो गया हो लेकिन मंदिर से जुड़ा यह संघर्ष बरकरार रहा। हालांकि अयोध्या को कुछ हद तक धार्मिक स्वायत्तता अवध के नवाबों के समय हासिल हुई लेकिन बार-बार योद्धाओं के सैलाब से तंग आकर नवाब सआदत अली खान ने दोनों पक्षों को पूजा एवं नमाज की अनुमति दी। लेकिन यह अनुमति भी इस संघर्ष को नहीं थाम सकी । इसके बाद दोनों समुदायों के मध्य मतभेद पैदा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1859 में तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिंदुओं को अलग-अलग प्रार्थना करने की इजाजत दी। इसके बाद 1885 में पहली बार यह मामला अदालत पहुंचा। महंत रघुवर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए एक अपील दायर की। फैजाबाद जिला कोर्ट के जज पंडित हरिशंकर ने माना कि हिंदुओं की पवित्र भूमि पर मस्जिद बनाई गई। मगर मंदिर बनाने की इजाजत नहीं दी। फैसले में कहा गया कि रास्ता एक है इसलिए मंदिर की इजाजत नहीं दी जा सकती, बाहरी अहाते पर पूजा होती है इसमें कोई संदेह नहीं है। इसके बाद 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने मामला दायर किया, जिसने उन्हें कोर्ट ने पूजा- अर्चना करने का अधिकार मिल गया। 












 

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में 1 फरवरी 1986 का दिन मील का पत्थर साबित हुआ। इस दिन इस विवाद में एक नया मोड़ आया। फैजाबाद जिला न्यायाधीश के आदेश पर विवादित स्थल का ताला खोला गया। तब देश में राजीव गांधी की सरकार थी और उन्हें की अनुमति से ताला खुलवाया गया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने यह मामला अपने पास मंगवा लिया। 1989 में रामलला विराजमान की ओर से याचिका दाखिल की गई और जन्म भूमि पर अधिकार मांगा गया। 6 दिसंबर 1992 को इतिहास को बदलने वाली घटना घटी। यह शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह दिन इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बनाएगा। बड़ी संख्या में भीड़ लगातार विवादित स्थल की तरफ बढ़ती जा रही थी। देखते ही देखते ढांचे के गुंबद पर उनका कब्जा हो गया। जिसके हाथ में जो था, उसी को आधार बनाकर सभी गुंबद ध्वस्त कर दिए गए और मूर्ति को विवादित स्थल पर स्थापित कर कारसेवकों द्वारा अस्थाई मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया गया। इसके बाद भले ही राजनीतिक उठापटक का दौर शुरू हो गया हो लेकिन एक बात सबके जहन में आ चुका था की इतिहास का एक पन्ना लिखा जा चुका है जिसका गवाह बना अयोध्या। इसके बाद 13 मार्च 2003 को असलम भूरे केस में कोर्ट ने तय किया कि विवादित स्थल पर किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जाएगी। सालों साल न्यायालय में तारीखों का दौर चलता रहा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को इसे न्यायिक दौर पर अपने फैसले से अंकुश लगाने का कोशिश किया। उच्च न्यायालय ने 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा व सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बांट दिया। लेकिन जैसा माना जा रहा था यह न्यायिक दौर यहां भी नहीं रुका और उच्चतम न्यायालय की तरफ रुख किया गया। 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के बाद उच्चतम न्यायालय ने 2018 में इस विवाद से जुड़े सभी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू किया। सुनवाई के दौरान शब्दों के कई बाण चले, अपने-अपने पक्षों को मजबूत करने के लिए बहुत सारे तथ्यों को पेश किया गया। सभी तथ्यों को जानने के बाद न्यायालय में इसकी सुनवाई पूरी हो गई।

 

9 नवंबर 2019, यह सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि देश के करोड़ों लोगों के इंतजार को खत्म करने वाला दिन था। सभी को फैसले का इंतजार था। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी संभावनाओं और अटकलों पर विराम लगाते हुए अपना फैसला सुनाया और विवादित भूमि का फैसला रामलला विराजमान के हक में सुनाया। उच्चतम न्यायालय के इस फैसले ने देश में सांप्रदायिक सौहार्द बनाने का काम किया। यह कहना गलत नहीं होगा किस फैसले ने देश में गंगा जमुनी तहजीब को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाया। सभी पक्षों द्वारा इस फैसले को स्वीकार करना भी देश के लोगों के आपसी भाईचारे को दर्शाता है और देश की अखंडता का जीता जागता उदाहरण बन जाता है।







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