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चार धामों की सरंक्षक - माँ देवी धारी

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उत्तराखंड का मूल निवासी होने के नाते, मैं हमेशा से ही इस देवभूमि की यात्रा करना चाहता था। मैं पहले भी कई अद्भुत और अछूते प्राकृतिक स्थलों पर घुमा हूं, लेकिन इस जगह ने मुझे हमेशा अविश्वसनीय कहानियों और कारनामों से चकित किया है। मेरा ये लेख उत्तराखंड के उन प्रमुख देवताओं में से एक के ऊपर है।

 

उत्तराखंड की रक्षक, लाखों लोगों की संरक्षक और चार धामों की सरंक्षक, ये वे नाम हैं, जिनसे माँ देवी धारी को उत्तराखंड के लोगों द्वारा बुलाया जाता है। समस्त भारत और विदेशी धरती के लोग शिलालेखों में देवी काली के प्रकोप से भलीभाँति अवगत हैं।


इस वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता कि देवी काली "शक्ति" के सबसे उग्र रूपों में से एक हैं। देवी धारी भी देवी काली के कई रूपों में से एक है, लेकिन धारी देवी मंदिर में, माँ काली की मूर्ति एक शांत मुद्रा में विराजमान है। किंवदंती है कि, पुराने दिनों में देवी काली के मंदिर के पास एक भयंकर बाढ़ आई थी, जिसके कारण देवी काली की मूर्ति का ऊपरी हिस्सा अलकनंदा नदी में बह गया था। मूर्ति का आधा हिस्सा उस समय धारी गाँव के पास एक चट्टान पर अटक गया, जब से ऊपरी भाग को उसी स्थान पर धारी गांव के स्थानीय लोगों द्वारा पूजा जाता है। देवी काली के दूसरे भाग को काली मठ में पूजा जाता है जहाँ माँ काली की प्रतिमा क्रोध वाली मुद्रा में विराजमान है। इस मंदिर की लोकप्रियता के कारण, हर साल लाखों भक्त इस मंदिर में आते हैं और माँ धारी देवी का आशीर्वाद लेते हैं, विशेषकर नए जोड़े। नवरात्रि के अवसर पर, आप पूरे भारत से और विदेशी धरती से भी भक्तों की भीड़ देख सकते हैं। सभी ट्रांसपोर्टर और पास से गुजरने वाले यात्री मां धारी का आशीर्वाद लिए बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाते।

माँ धारी देवी का मंदिर उत्तराखंड में श्रीनगर और रुद्रप्रयाग जिले के बीच स्थित है। केवल धारी गाँव के पंडित ही देवी धारी की पूजा करते हैं। ठंडी हवाओं के बीच, सूर्य के चमकीले प्रकाश के नीचे, अलकनंदा नदी के पवित्र जल से घिरी हुई, माँ प्रकृति से सुसज्जित, यह मंदिर बिल्कुल एक ऐसी जगह पर है जहाँ आप मन की शांति प्राप्त कर सकते हैं।


इस मंदिर के बारे में कई कहानियां हैं जो इस जगह को और अधिक रहस्यमय बनाती हैं और उल्लेखनीय रूप से खोजबीन करने योग्य हैं। ऐसी ही एक कहानी है कि मां धारी देवी की मूर्ति दिन में तीन बार चेहरा बदलती है, पहली बारी में कन्या का फिर एक महिला का और अंतिम में वृद्धा का।


दूसरी कहानी पर विश्वास करना असंभव सा लगता है, यह एक संयोग भी हो सकता है, लेकिन उत्तराखंड के स्थानीय और कई लोगों को इस पर पूर्ण विश्वास ​​है। 2013 में विनाशकारी बाढ़ से उत्तराखंड बुरी तरह प्रभावित हुआ, जिससे पूरे राज्य में उत्पात मचा था। बादल फटने से ठीक पहले, अलकनंदा नदी पर पनबिजली परियोजना के कारण अधिकारियों ने माँ धारी की मूर्ति को उसके मूल मंदिर से स्थानांतरित कर दिया था। स्थानीय लोगों का अखंड विश्वास है कि यह आपदा चार धामों की रक्षक माँ धारी देवी के क्रोध के कारण हुई थी क्योंकि मूर्ति को उसके मूल स्थान से हटा दिया गया था। उसके बाद जल्द ही अधिकारियों ने मूर्ति को वापस पहले वाले मंदिर के ऊपर बहुत सारे पिल्लर बना कर स्थापित किया। इससे इस प्रश्न का उत्तर तो मिल जाता है कि यह मंदिर नदी के बीचों बीच क्यों है, वह भी ऐसी जगह पर जहां डूबने की संभावना बहुत अधिक है।

 

ये लेख अमित सिंह नेगी द्वारा दिया गया है। आप हमें अपने लेख मेल (Gmail) कर सकते है।

 


 

नोट: अनुचित लेख पब्लिश नहीं किये जायेंगे।  


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