तीन तलाक (Triple Talaq) पर कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला || Court gave important decision on triple talaq

Abhishek Jha
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आज हम बात करेंगे ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) पर, अब आप सोच रहे होंगे कि यह तो पुराना मुद्दा है बिल बहुत पहले आया आज क्यों इस बारे में  बात किया जा रहा है। इस मसले पर आज दोबारा इसलिए बात कर रहे हैं क्योंकि कोर्ट ने ट्रिपल तलाक(Triple Talaq) के मुद्दे पर आज अपना एक अहम फैसला सुनाया है।

गुजरात के बनासकांठा जिले में ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) मामले में कोर्ट ने एक क्लास वन अफसर को एक साल की सजा सुनाई है, साथ ही पांच हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) पर कानून बनने के बाद यह गुजरात का पहला मामला है, जिसमें कोर्ट ने आरोपी को सजा सुनाई है। 

आपको बता दें की अफसर ने अपनी पत्नी को तीन तलाक देकर दूसरी महिला से शादी कर ली थी, उसे ऑफिस में काम करने वाली युवती से प्यार हुआ और वो उसके साथ फरार हो गया, उसे और युवती को उनके परिवार वाले लेकर आए,  उस आदमी ने वादा किया कि वो उस लड़की से कभी बात नहीं करेगा, इसके बावजूद दोनों के बीच रिश्ता रहा, जिसके बाद लड़की और उस व्यक्ति को एक बेटा भी हुआ, जब शहनाज बानो को इसकी जानकारी हुई तो दोनों के बीच झगड़ा हुआ और  उस व्यक्ति ने उसे तीन तलाक (Triple Talaq) दे दिया, शहनाज बानो ने इस मामले में पालनपुर पश्चिम पुलिस थाने में मुस्लिम प्रोटेक्शन ऑफ एक्ट के तहत मामला दर्ज करवाया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने सरफराज को जुर्माने के साथ एक साल की सजा सुनाई।

तो यह था ताजा मामला जिसमें ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) देने पर महिला को इंसाफ दिया गया। अब ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) के बारे में हम आपको थोड़ी गहराई से बताएंगे। ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) शरिया कानून (इस्लामी कानून) के तहत तलाक की प्रक्रिया है जहां एक पति तीन बार 'तलाक' का उच्चारण करके अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। इसे मौखिक तलाक भी कहा जाता है।

इस्लामिक कानून के तहत तीन तरह के तलाक होते हैं, अहसान, हसन और तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक)।

तीन तलाक (Triple Talaq) के कानून के तहत पत्नियां तीन तलाक के जरिए पति को तलाक नहीं दे सकती हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 के तहत महिलाओं को अपने पति को तलाक देने के लिए अदालत का रुख करना पड़ता है। 

अब यह मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 क्या है?

 तो आपको बता दें की यह अधिनियम भारत में मुसलमानों के लिए शरीयत या इस्लामिक पर्सनल लॉ लागू करने का प्रावधान करने के लिए पारित किया गया था

 और यह एक्ट 1937 में ब्रिटिश राज द्वारा पारित किया गया था। और भारत के ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद, भारतीय समाज में शरीयत अधिनियम को बनाए रखा गया था।

ट्रिपल तलाक  (Triple Talaq) के जरिए हमेशा है आरोप लगा कि इसमें मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है, और यहां से यह बात सीधा पहुंच जाती है शाहबानो केस (Shahbano case) पर 1985, 

दिन था 3 फरवरी 1981, न्यायमूर्ति मुर्तजा फजल अली और ए. वरदराजन की दो न्यायाधीशों की पीठ ने, जिन्होंने पहली बार इस मामले की सुनवाई की, कहा गया कि संहिता की धारा 125 मुसलमानों पर भी लागू होती है। धारा 125 में पत्नी, बच्चे और माता-पिता के भरण-पोषण का प्रावधान है।

अब बात यहीं नहीं रुकी,  यह जा पहुंची बड़ी बेंच के पास और इसमें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board)और जमीयत उलेमा-ए-हिंद (Jamiyat Ulema-e-hind)भी शामिल हुए। तब इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़, रंगनाथ मिश्रा, डी.ए. देसाई, ओ. चिन्नप्पा रेड्डी और ई.एस. वेंकटरमैया की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने की थी। 23 अप्रैल 1985 को, सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक सर्वसम्मत निर्णय में, अपील को खारिज कर दिया और कह दिया कि  न्यायालय का निर्णय मान्य होगा। 

आपको बता दें कि जब मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में पहुंचा, तब सात साल बीत चुके थे।यानी मोहम्मद अहमद खान ने अपनी पत्नी शाहबानो को 7 साल पहले ही तलाक दे दिया था। और शाहबानो (Shahbano) पिछले 7 साल से न्याय के लिए कोर्ट के चक्कर लगा रही थी। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125  को लागू  किया, जो जाति, पंथ या धर्म की परवाह किए बिना सभी पर लागू  होता है।  सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने फैसला सुनाया कि शाह बानो को गुजारा भत्ता दिया जाना चाहिए। 

न्यायालय ने यह भी कहते हुए खेद व्यक्त किया कि भारत में समान नागरिक संहिता लाने के संबंध में भारत के संविधान (Constitution of India) का अनुच्छेद 44 (Article 44) एक मृत पत्र बना हुआ है और यह माना जाता है कि एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले कानूनों के प्रति असमान निष्ठा को हटाकर राष्ट्रीय एकीकरण के उद्देश्य में मदद करेगी। तो आप समझ सकते हैं कि कैसे सुप्रीम कोर्ट 1985 में ही यह कह रहे थे कि देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil code) लागू होना चाहिए जो अब तक नहीं हुआ, हालांकि अभी की सरकार इसे लागू करने की बात कह रही है, क्या होगा यह तो भविष्य ही बताएगा।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के इस फैसले के बाद देशव्यापी चर्चा, बैठकें और आंदोलन हुए। दबाव इतना बढ़ गया कि तत्कालीन सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर सुरक्षा का अधिकार) अधिनियम (MWA) पारित किया, जिसने मुस्लिम महिलाओं के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 को अनुपयुक्त बना दिया।यानी धारा 125 से मुस्लिम महिलाओं को हटा ही दिया गया,  इसका सीधा सीधा मतलब यही निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने जो ऐतिहासिक फैसला दिया था वह  तत्कालीन सरकार के निर्णय से निरर्थक हो गया। यानी शाहबानो जी की  सालों की मेहनत और कोर्ट का फैसला पानी में चला गया।

डेनियल लतीफी मामला (Daniel Latifi) - मुस्लिम महिला अधिनियम (एमडब्ल्यूए) को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह अनुच्छेद 14 और 15 (Article 14 and 15) के तहत समानता के अधिकार के साथ-साथ अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है।

 सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कानून को संवैधानिक मानते हुए इसे सीआरपीसी की धारा 125 (crpc act 125) के साथ सामंजस्य स्थापित किया और कहा कि इद्दत की अवधि के दौरान पत्नी को प्राप्त राशि इतनी बड़ी होनी चाहिए कि वह इद्दत के दौरान उसे बनाए रखने के साथ-साथ उसके भविष्य के लिए भी प्रदान कर सके। इस कानून के तहत, एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला जीवन भर या जब तक वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती, भरण-पोषण के प्रावधान की हकदार है।

इसके बाद वह केस आया जिसने इस पूरे ट्रिपल तलाक के मुद्दे को बदल कर रख दिया और वह केस है शायरा बानो केस,  35 वर्षीय महिला शायरा बानो ने तीन तलाक प्रथा के तहत तलाक  मिलने के बाद इस प्रथा को चुनौती  दिया था। 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने 3-2 के ऐतिहासिक फैसले में तत्काल तीन तलाक को रद्द कर दिया था। पांच में से तीन न्यायाधीशों ने इस प्रथा को गैर-इस्लामी और "मनमाना" कहा था और इस विचार से असहमत थे कि तीन तलाक धार्मिक अभ्यास का एक अभिन्न अंग था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला (Supreme court judgement) वास्तव में भारत में महिला सशक्तिकरण आंदोलन में एक महत्वपूर्ण क्षण है। न्यायालय ने संविधान में निहित प्रगतिशील विचारों को समाज में पर्सनल लॉ से ऊपर रखा।

उसके बाद आया मोदी सरकार का ट्रिपल तलाक बिल,  इस बिल ने इस पूरे मुद्दे को जड़ से खत्म कर दिया। इसमें कहा गया की तलाक-ए-बिदत को मौखिक, लिखित या एसएमएस या व्हाट्सएप या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक चैट के माध्यम से अवैध घोषित किया  जाता है।

और इतना ही नहीं इस बिल ने तलाक-ए-बिदत को संज्ञेय अपराध  बना दिया जिसके तहत एक पुलिस अधिकारी  बिना वारंट के अपराधी को गिरफ्तार कर सकते हैं।

इस बिल के तहत अगर एक मुस्लिम व्यक्ति जो तत्काल ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) का उच्चारण करता है तो उसे तीन साल की जेल की सजा हो सकती है। तीन तलाक बिल के तहत आरोपी जमानत का हकदार है, जिसे मजिस्ट्रेट द्वारा दिया जा सकता है। लेकिन जमानत तभी  दिया जा सकता है जब मजिस्ट्रेट पीड़ित महिला की बात सुन ले।

इसमें तलाकशुदा महिला अपने और अपने आश्रित बच्चों के लिए भरण-पोषण की मांग करने की हकदार है। निर्वाह भत्ते की राशि निर्धारित करने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास है।  वह जो राशि सही समझे उसे निर्धारित कर सकते हैं।

तो आपने देखा की ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) का यह मुद्दा कितने सालों से देश में चर्चा का विषय बना हुआ था,  इस पर राजनीति भी हुई, कई बार कोर्ट के फैसले भी आए, और आखिर में जाकर के संविधान की जीत हुई।

 हम यह नहीं कह रहे कि सभी मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार हो रहा था लेकिन ऐसा जरूर कहा जा सकता है कि ज्यादातर मुस्लिम महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा था और हमारे देश के इस संवैधानिक व्यवस्था ने एक बार फिर अपनी ताकत का एहसास कराया और मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिया।



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